
महासमुंद/बसना। शासकीय प्राथमिक शाला-करनापाली में वंदे मातरम् गीत का 150 वीं वर्षगांठ मनाया गया। जहां विद्यालय के बच्चों ने मां भारती के वेषभूषा में आए वहीं लड़कों ने भी कृषक बन कर आये जो आकर्षक का केंद्र बिन्दु रहा। विद्यालय में सुबह की प्रार्थना में साउंड सिस्टम के साथ पूरे वंदे मातरम् गीत को लिया गया।
तत्पश्चात भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी का उद्बोधन स्मार्ट टीवी के माध्यम से देखा-सुना गया। प्रधानमंत्री ने अपनी भाषण में इस गीत के महत्व को बताते हुए कहा कि हर गीत का एक संदेश होता है और इस गीत में भी राष्ट्रीय एकता को पिरोये रखने का संदेश है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विद्यालय के प्रधान पाठक गिरधारी साहू ने इस गीत का उद्गम पर प्रकाश डाला उन्होंने बताया कि वर्ष 1875 में महान देशभक्त बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास “आनंदमठ” में “वंदे मातरम्” की रचना की थी।यह गीत भारतमाता के प्रति श्रद्धा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक बना।स्वतंत्रता संग्राम के दौरान “वंदे मातरम्” के उद्घोष से पूरा देश गूंज उठा। यह गीत देशभक्तों के हृदय में जोश, साहस और एकता का संदेश भरता रहा।
गीत के अमर शब्द :> वंदे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्,
शस्यशामलाम् मातरम्!
इन पंक्तियों में भारतीय धरती की सुंदरता, समृद्धि और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना झलकती है।150 वर्षों की गौरव यात्रा में 1875 “वंदे मातरम्” की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा1905 बंग-भंग आंदोलन में यह गीत स्वतंत्रता का नारा बना।1937 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता मिली।1947 स्वतंत्र भारत में “जन गण मन” राष्ट्रगान बना और “वंदे मातरम्” राष्ट्रीय गीत घोषित हुआ। 2025 : 150वीं वर्षगांठ – राष्ट्रभक्ति, एकता और मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक वर्ष है।
आगे कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विद्यालय के शिक्षक वीरेन्द्र कुमार कर ने कहा कि > “वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, यह भारत के आत्मसम्मान और एकता का प्रतीक है।”
वहीं उपस्थित विद्यालय के शिक्षिका निर्मला नायक ने भी इस राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हुए इस गीत का अर्थ स्पष्ट किया।





